जी हाँ मैं अनाम रहना चाहता हूँ। क्योंकि तुम जोड़ दोगे कोई चिप्पी (Tag) हिन्दू, मुस्लिम, बिहारी, मद्रासी, शहरी, देहाती का ।
और जोड़ दोगे उसके साथ अपनी पूर्व गढ़ी हुई परिभाषाएँ जैसे कि मुस्लिम निर्दयी होते हैं, बिहारी भ्रष्ट होते हैं, पंजाबी झगड़ालू होते हैं, बंगाली आलसी होते हैं, मराठी बिहारियों के दुश्मन हैं इत्यादि।
क्योंकि तुमने गढ़ रखी है परिभाषा अपने हरेक चिप्पी के लिए।
तुम्हारे पास हरेक रंग की चिप्पी है धर्म, जाति, वर्ग, समुदाय आदि इत्यादि के लिए बस उन रंगों को छोड़ कर जो तुम्हारे जैसे अन्य लोग तुम्हारे लिए बना कर रखे हुए हैं।
क्यों कि हरेक चिप्पी कत्ल कर देती है मेरी विशिष्टता (individuality) का और उस सत्य का कि मैं अलग हूँ । मेरी अच्छाइयाँ, मेरी बुराइयाँ (हाँ मैं एक साथ अच्छा और बुरा दोनो हो सकता हूँ क्योंकि मैं इंसान हूँ।) उतनी ही मेरी अपनी हैं और मेरे अन्य भाईयों से अलग हैं जितनी की मेरी शक्ल । मैं इंसान हूँ कोई Assembly Line से निकला हुआ उत्पाद नहीं । एक ही गर्भ से जन्मे दो भाई क्या एक जैसे होते है तो फिर एक परिवेश, जाति अथवा जगह में जन्में लोग एक कैसे हो सकते हैं । Assembly Line से निकले हुए उत्पाद भी कभी कभार अपने भाईयों से अलग बन जाते हैं, वरना गुणवता नियंत्रण विभाग की ज़रूरत हीं नहीं रहती ।
पर तुम क्यों मानोगे मेरी दलीलें, क्योंकि तुमने मान रखा है कि तुम सर्वश्रेष्ठ हो, तुममे कोई कमी नहीं है, कोई तुम पर उंगली नही उठा सकता है । क्योंकि तुम खुश हो यह मान कर कि तुम त्रुटिरहित (Perfect) हो तुममें सुधार कि कोई गुंजाईश नहीं । तुम्हारी हरेक कमियाँ न्यायोचित (justified) हैं । फिर भी एक विनती है, कभी इस मनोवृत्ति से बाहर निकल कर देखो। तुम पाओगे कि दुनिया वाले कितने भिन्न हैं एक दुसरे से, सबकी अपनी-अपनी कमियाँ है, अपने-अपने गुण हैं । और बच जाओगे अन्यायपूर्ण व्यवहार करने से। और बच जाओगे अन्यायपूर्ण व्यवहार पाने से क्यों कि लोग भी हटा देंगे तुम्हारे उपर से वह चिप्पी जो उन्होनें तुम पर लगा रखी है ।
तब तक मैं (M) अनाम (A) रहना (R) चाहता (C) हूँ (H)।
MARCH
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Sunday, 25 April 2010
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